TTN डेस्क
नई दिल्ली।भारतीय नागरिक उड्डयन क्षेत्र में एक बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है। देश के प्रमुख हवाई अड्डों का संचालन करने के बाद अब अडानी समूह अपनी खुद की एयरलाइन शुरू करने की तैयारी में है।
हाल ही में नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने संकेत दिए हैं कि सरकार इस प्रस्ताव के फायदे और नुकसान का विश्लेषण कर रही है।
📌 इस खबर के प्रमुख बिंदु:
मौजूदा नियम और मांग: 2006 के PPP मॉडल नियमों के तहत दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डे के संचालक किसी एयरलाइन में 10% से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकते। अडानी समूह ने इन नियमों में ढील देने की मांग की है।
सरकार की सोच: नागरिक उड्डयन मंत्री के अनुसार, भारत में नए हवाई अड्डे बन रहे हैं और हवाई यात्रा की मांग लगातार बढ़ रही है। सरकार का लक्ष्य देश में कम से कम 5 ऐसी एयरलाइनें स्थापित करना है, जिनके पास 100+ विमानों का बेड़ा हो।
बाजार में दबदबा खत्म करने की कोशिश: फिलहाल भारतीय विमानन बाजार में इंडिगो (66.3% हिस्सेदारी) और एयर इंडिया का एकछत्र राज है। सरकार इस वर्चस्व को तोड़कर प्रतिस्पर्धा बढ़ाना चाहती है।
उद्योग में विभाजन: अडानी की इस मांग से एविएशन इंडस्ट्री दो गुटों में बंट गई है— जहाँ इंडिगो के प्रमोटर राहुल भाटिया इसका विरोध कर रहे हैं, वहीं अकासा एयर के संस्थापक विनय दुबे ने इसका समर्थन किया है।
📉 क्यों है नई एयरलाइंस की जरूरत?
पिछले एक दशक में जेट एयरवेज और गोएयर जैसी कई बड़ी एयरलाइंस बंद हो चुकी हैं, जबकि स्पाइसजेट और अकासा संघर्ष कर रही हैं। दुनिया के चौथे सबसे बड़े एविएशन मार्केट यानी भारत को यात्रियों की बढ़ती संख्या को संभालने के लिए और अधिक एयरलाइंस की सख्त जरूरत है।




