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लोगों का पहनावा नहीं आपके प्रति उनके मन का भाव देखें-आचार्यश्री मृदुलकांत शास्त्री ,कबूलपुरिया परिवार के भागवत आयोजन की बुधवार को पूर्णाहुति

Nishant Manoj SharmaBy Nishant Manoj SharmaSeptember 10, 2024
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कोरबा। आशीर्वाद प्वाइंट, पं. दीनदयाल सांस्कृतिक भवन टीपी नगर कोरबा में कबुलपुरिया परिवार द्वारा पितृ मोक्षार्थ गया श्राद्ध निमित्त श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह महोत्सव के सातवें दिन सुदामा चरित्र एवं सुकदेव विदाई के साथ कथा को विराम दिया गया। भागवत कथा के अंतिम दिन कल हवन, सहस्त्र धारा, पूर्णाहुति एवं प्रसाद वितरण के साथ भगवत कथा ज्ञान सप्ताह संपन्न हो जाएगा।
आज कथा के अंतिम दिन आचार्यश्री शास्त्री ने सुदामा और कृष्ण की मित्रता का वर्णन संगीतमय कथा के माध्यम से श्रोताओं को ऐसा रसपान कराया कि कथा श्रवण कर्ता स्वयं को सुदामा मानकर कृष्ण की अद्भूत लीला का आनंद लिया। संगीतमय कथा सुनकर कई श्रद्धालुओं के नेत्रों से आंसू बह रहे थे। आचार्यश्री भी सुदामा चरित्र का वर्णन करते-करते अश्रु पोंछते नजर आये। आचार्यश्री के श्रीमुख से भगवत गंगा ऐसी बह रही थी, मानो साक्षात सुदामा और कृष्ण का अद्भूत मिलन हमारी नजरों के सामने तैर रहा हो। कथा के साथ-साथ सुदामा का,कृष्ण-रूक्मिणी से भेंट करने जाते समय पर साक्षात दृश्य लोगों को ऐसा भाया, मानो मंच पर लीला हो रही हो, ऊपर से अद्भूत संगीत की धून पर लोग भाव विभोर हो रहे थे।

सुदामा चरित्र के माध्यम से आचार्य श्री शास्त्री ने संदेश दिया कि भगवान की भक्ति सुदामा का चरित्र अपनाकर करें, तो भगवान चले आते हैं। दुनिया में सुदामा से भाग्यवान कोई नहीं, जिनके स्वागत के लिए भगवान स्वयं दौड़े चले आते हैं। कृष्ण से मिलने जाने से पहले सुदामा अपनी धर्मपत्नी सुशीला से कहते हंै कि मैं मित्र से मिलने कैसे जाऊं? उन्हें देने के लिए हमारे पास कुछ नहीं। गुुरू की तरह सुशीला बोलती हैं- ठाकुर जी से मिलने के लिए आप कदम तो बढ़ाएं, बाकी व्यवस्था मैं करती हूं और उन्होंने चार घरों में जाकर भीक्षाटन से जो चावल (पोहा)मिला, उसे पोटरी में बांधकर भगवान की भेंट के लिए सुदामा को दे दिया। भगवान भाव के भूखे होते हैं। जब सुदामा द्वारिका पहुंचे तो वहां भी दरबान से हिचकते हुए कृष्ण के लिए संदेश दिया और कहा -कृष्ण से कहना कि एक गरीब ब्राम्हण सुदामापुरी (पोरबंदर) से आया है और बता रहा है कि उज्जयिनी में संदीपनी आश्रम में एक साथ शिक्षा-दीक्षा लिए हैं। दरबान ने जब कृष्ण को यह संदेश दिया, तो कृष्ण अपने प्रिय मित्र से मिलने के लिए ऐसा आतुर हुए कि वे अपने सभी व्यस्त कार्यक्रमों को छोडक़र दौड़ते हुए सुदामा से मिले और उनका भव्य स्वागत करते हुए उन्हें गले से लगाया और विनम्रता पूर्वक अंदर ले गए और अपनी गद्दी में अपने बगल में बिठाया। ऐसा दृश्य कथा स्थल पर मानो स्वर्ग का एहसास करा रहा हो। भाव विभोर श्रोतागण आचार्य श्री की कथा सुनकर ऐसा एहसास कर रहे थे कि मानो यह सब दृश्य आंखों के सामने परिलक्षित हो रहे हों। अपनी दिव्यवाणी से आचार्य श्री ने प्रहसनों के माध्यम से बताया कि जब आपके घर में कोई मिलने आता है तो उनका पहनावा न देखें, बल्कि आपके प्रति उनके मन का भाव देखें। कृष्ण ने सुदामा के जीर्णशीर्ण कपड़े, नंगे पैर को नहीं देखा और प्रिय मित्र के भाव को एहसास किया। गद्दी में बैठे सुदामा ने कृष्ण से कहा कि मित्र! मेरे गरीब ब्राम्हण के आने से राजमहल के सम्मान में आघात तो नहीं लगा? यह शब्द सुनकर कृष्ण की आंखों में आंसू आ गए और जवाब में कहा- दुनिया का सबसे प्रिय मित्र मुझसे नंगे पैर मिलने इतने दूर से आया है, मैं तो धन्य हो गया और यह महल भी सम्मान से आलोकित हो रहा है, आज मेरा प्रिय मित्र जो आया है।

आचार्य शास्त्री ने कहा कि कृष्ण ने सुदामा की झोली भर दी, लेकिन स्वाभिमान ब्राम्हण को वहां पर कुछ नहीं दिया और घर जाने के लिए विदाई दे दी। रास्ते भर सुदामा सोचता रहा कि घर में बच्चे और पत्नी भूखे होंगे और कृष्ण ने कुछ नहीं दिया। उदास मन से जब घर पहुंचा तो सुदामा की आंखें चौंधिया गईं। अपने घर को वह पहचानने में भ्रमित हुआ और घर के अंदर प्रवेश किया तो उसका घर महल जैसा और सभी सुख सुविधाओं से आबाद हो चुका था। यह मित्रता की महिमा ही है। मित्रता करनी हो तो सुदामा और कृष्ण जैसी, वरना मित्रता करें ही नहीं। जो दुख में काम आये, वही सच्चा मित्र होता है। भाव विभोर श्रद्धालुओं/ श्रोताओं की भीड़ से पूरा हॉल घंटों तक शांत था और सुदामा-कृष्ण के प्रहसन से सिर्फ मन में उनकी तस्वीरें तैर रही थीं। अद्भूत है सुदामा- कृष्ण की मित्रता। श्री शास्त्री ने कहा कि रिश्तों को प्रगाढ़ता दें और अपना स्वार्थ त्याग कर परिवार के सुख दुख में साथ रहें, मित्रता को आगे बढ़ाएं, माता-पिता का आदर करें और सेवा सत्कार से अपने जीवन को आबाद करें। समाज को कुछ देना सीखें, यही जीवन है। कथा के अंत में सुकदेव जी को विदाई दी गई और आचार्य श्री ने यहीं कथा को विराम दिया और इतने बड़े आयोजन के लिए कबुलपुरिया परिवार के सदस्यों से कहा कि स्वयं और पितरों के लिए इतना समय निकालना बड़ी बात है और जो स्वयं के लिए समय निकालें और आध्यात्म में गुजारे तो स्वयं का जीवन और पितर धन्य हो जाते हैं। आचार्य श्री के कहने पर पूरा कथा कक्ष राधे-राधे के जयकारों से गूंज उठा।

सुदामा और कृष्ण-रूक्मिणी की झांकी ने सबको आकर्षित किया

आज कथा के अंतिम दिन आचार्य श्री मृदुलकांत शास्त्री ने सुदामा-कृष्ण मित्रता की कथा से सबको रसपान कराया। इस अवसर पर आकर्षित सुदामा और कृष्ण-रूक्मिणी की झांकी का प्रदर्शन किया गया। सुदामा-कृष्ण मिलन अद्भूत था।

कल हवन, सहस्त्रधारा, पूर्णाहूति एवं प्रसाद वितरण

कबुलपुरिया परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के अंतिम दिन कल प्रात: हवन-पूजन, सहस्त्रधारा और पूर्णाहूति के साथ ज्ञान यज्ञ संपन्न हो जाएगा और अंत में उपस्थितजनों को प्रसाद वितरित किया जाएगा। आयोजक परिवार ने सहस्त्रधारा का लाभ लेने कोरबा वासियों से सादर आग्रह किया है।

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