कोरबा। समस्त रागादि भावों (मोह, मान ,माया, लोभ, क्रोध) के त्याग पूर्वक आत्म स्वरूप में, अपने में लीन होना अर्थात् आत्मलीनता द्वारा विकारों पर विजय प्राप्त करना ही “उत्तम तप” है। यहां “तप” के साथ लगा “उत्तम” शब्द ,सम्यक दर्शन की सत्ता का सूचक है ।उक्त विचार सात दिनों से चल रहे बुधवारी बाजार स्थित दिगंबर जैन मंदिर में पर्यूषण पर्व पर सातवें दिन के प्रवचन के दौरान जयपुर से पधारे पंडित रोहित शास्त्री जी ने कही। कि नास्ति से इच्छाओं का अभाव और अस्ति से आत्म स्वरूप में लीनता ही “तप “है ।सम्यक दर्शन के बिना किया गया “तप” निरर्थक है ।यदि कोई जीव सम्यकत्व के बिना करोड़ों वर्षों तक उग्रतप भी करें ।तो भी वह ज्ञान लाभ प्राप्त नहीं कर सकता है। देह और आत्मा का भेद नहीं जानने वाला अज्ञानी ,यदि घोर तपश्चरण भी करें ।तब भी वह मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता ।जो अविनाशी आत्मा को शरीर से भिन्न नहीं जानता ,वह घोर तपश्चरण करके मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता ।जगत में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो निर्दोष तप से पुरुष को प्राप्त न हो सके। अर्थात “तप” से सर्व उत्तम पदार्थ की प्राप्ति होती है। संसार में जो भी वस्तु दिखाई देती है ।वह वस्तु कहीं-ना-कहीं ,किसी-न-किसी प्रकार के “तप” के बगैर निर्माण नहीं हुई है।
जैन मिलन समिति के उपाध्यक्ष श्री दिनेश जैन ने बताया कि हर वस्तु को ताप के सहारे गर्म कर पिघलाकर उसे एक सांचे में ढाल कर एक नई आकृति मिलती है ।तभी वह हमारे उपयोग में आती है ।एक ही प्रकार के पदार्थ से बने वस्तु को तप के सहारे ही भिन्न-भिन्न आकृतियों में ढाला जाता है। वह पदार्थ नए आकृति में ढालकर भिन्न-भिन्न प्रकार से ,नए रूप में, स्वरूप में हमारे लिए उपयोगी होती है। ठीक उसी प्रकार से मनुष्य को अपने काम, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि को “तप” के सहारे, “तप” के माध्यम से पिघलाकर ,जलाकर अपने आत्म स्वरूप का बोध करना ही “उत्तम तप” है।
इस प्रकार पर्यूषण पर्व पर सातवें दिन समस्त जैन समाज के लोगों ने “उत्तम तप” के बारे में अधिक से अधिक धर्मज्ञान, तत्व ज्ञान प्राप्त किया। प्रात 7:00 बजे से ही श्री जी का अभिषेक, शांतिधारा श्री प्रमोद जैन द्वारा की गई एवं नित्य नियम पूजन किया गया ।शाम 7:00 बजे से आरती एवं 8:00 बजे से “उत्तम तप” के बारे में प्रवचन किया गया। जिसमें अपार संख्या में पुरुष व महिलाएं एवं बच्चे उपस्थित हुए।उक्त प्रकार की समस्त जानकारी समिति के उपाध्यक्ष दिनेश जैन दी।
विकारों पर विजय प्राप्त करना उत्तम तप:रोहित शास्त्री
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