
TTN Desk
12 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट में बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इस सुनवाई में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनीं। यह मामला बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और मतदाताओं के बहिष्करण के आरोपों से जुड़ा है, जिसने देशभर में राजनीतिक और सामाजिक विवाद को जन्म दिया है।
0 10 मिनट का समय दिया कोर्ट ने मगर आधे घंटे सुना योगेंद्र यादव की दमदार दलीलों को
सामाजिक कार्यकर्ता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव, जो इस मामले में याचिकाकर्ता भी हैं, ने व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में अपनी बात रखी। उन्होंने SIR प्रक्रिया में गंभीर खामियों को उजागर किया और इसे मतदाताओं के मताधिकार से वंचित करने का एक प्रयास बताया। यादव ने कोर्ट में दो ऐसे व्यक्तियों (एक पुरुष और एक महिला) को पेश किया, जिन्हें बिहार में SIR की ड्राफ्ट सूची में मृत घोषित कर उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था, जबकि वे जीवित थे। इस दावे ने कोर्ट में उपस्थित सभी को चौंका दिया।
0 यादव के प्रमुख तर्क
65 लाख मतदाताओं पर प्रभाव: योगेंद्र यादव ने दावा किया कि SIR प्रक्रिया के कारण बिहार में 65 लाख से अधिक मतदाताओं को प्रभावित किया गया है। उन्होंने इसे भारत के इतिहास में मताधिकार से वंचित करने की सबसे बड़ी प्रक्रिया करार दिया।
प्रक्रिया की विफलता: यादव ने कहा कि SIR प्रक्रिया पूर्णता, सटीकता और समानता के तीनों मानदंडों पर विफल रही है। उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि भारत में मतदाता पंजीकरण की दर 99% है, जो विश्व में सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन बिहार में SIR के बाद यह 97% से घटकर 88% हो गई।
कोई नया नाम नहीं जोड़ा गया: यादव ने यह भी उजागर किया कि SIR प्रक्रिया में एक भी नया मतदाता नाम नहीं जोड़ा गया, जो भारत के इतिहास में पहली बार हुआ। उन्होंने इसे मतदाताओं को हटाने का सुनियोजित प्रयास बताया।
महिलाओं और गरीबों पर असर: यादव ने कोर्ट को बताया कि इस प्रक्रिया से विशेष रूप से महिलाओं और गरीब वर्ग के मतदाताओं को नुकसान हुआ है, क्योंकि पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं को स्थानांतरित या मृत घोषित किया गया।
0 सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया योगेंद्र यादव का धन्यवाद?
सुनवाई के अंत में, जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने योगेंद्र यादव की दलीलों और विश्लेषण की सराहना की। कोर्ट ने कहा, “हम आपकी बात से सहमत हों या न हों, लेकिन आपका विश्लेषण शानदार है।” जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि उन्हें गर्व है कि देश के नागरिक अपनी बात रखने के लिए कोर्ट में आ रहे हैं। कोर्ट ने योगेंद्र यादव को उनके तथ्यपरक और तार्किक विश्लेषण के लिए धन्यवाद दिया, क्योंकि उन्होंने SIR की खामियों को आंकड़ों और तथ्यों के साथ प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
0 अन्य वकीलों की दलीलें
कपिल सिब्बल: वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि SIR प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने की जिम्मेदारी आपत्ति दर्ज करने वाले की होती है, न कि मतदाता की। सिब्बल ने यह भी बताया कि बिहार के कई लोगों के पास मांगे गए 11 दस्तावेजों में से अधिकांश नहीं हैं, जैसे जन्म प्रमाणपत्र (केवल 3.056% के पास) या पासपोर्ट (2.7% के पास)।
प्रशांत भूषण: वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि चुनाव आयोग ने 65 लाख मतदाताओं को हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं दिखाई। उन्होंने बताया कि बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) ने बिना जांच के “अनुशंसित/गैर-अनुशंसित” के आधार पर नाम हटाए।
अभिषेक मनु सिंघवी: सिंघवी ने SIR को एक छलावा बताया और कहा कि 2003 की मतदाता सूची में शामिल 5 करोड़ लोगों को फिर से सत्यापन के लिए दस्तावेज मांगना अनुचित है।
0 चुनाव आयोग के वकील ने कहा ये नाटकीय दलीलें
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि SIR प्रक्रिया मतदाता सूची को साफ और अद्यतन करने के लिए आवश्यक है। उन्होंने योगेंद्र यादव की दलीलों को “नाटकीय” और “टीवी स्टूडियो के लिए उपयुक्त” करार दिया। आयोग ने कहा कि ड्राफ्ट सूची में त्रुटियां हो सकती हैं, जिन्हें अंतिम सूची में सुधारा जा सकता है। आयोग ने यह भी बताया कि 2003 की मतदाता सूची में शामिल लोगों और उनकी संतानों को दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं है।
0 सुनवाई के दौरान कोर्ट ने क्या कहा…
विश्वास की कमी: सुप्रीम कोर्ट ने SIR विवाद को “विश्वास की कमी का मुद्दा” बताया। कोर्ट ने कहा कि अगर 7.9 करोड़ मतदाताओं में से 7.24 करोड़ ने जवाब दे दिया है, तो 1 करोड़ मतदाताओं के हटाए जाने का दावा अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है।
प्रक्रिया पर सवाल: कोर्ट ने चुनाव आयोग से तथ्यों और आंकड़ों के साथ तैयार रहने को कहा, क्योंकि मतदाताओं की संख्या, मृतकों की संख्या और अन्य विवरणों पर सवाल उठेंगे।
अंतरिम रोक से इनकार: कोर्ट ने फिलहाल SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन कहा कि अगर याचिकाकर्ता सितंबर तक प्रक्रिया को अवैध साबित कर देते हैं, तो इसे रोका जा सकता है।
0 13 अगस्त को फिर सुनवाई,जरूरी हुआ तो रोज सुनवाई भी हो सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 13 अगस्त 2025 (आज) के लिए निर्धारित की है। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि आवश्यक हुआ तो वह लगातार सुनवाई करेगा ताकि किसी को यह शिकायत न हो कि उनकी बात नहीं सुनी गई।


