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मजदूरी की बेड़ियों से निकलकर बनीं ‘मशरूम दीदी’: गंगोत्री की स्वावलंबन की अनूठी मिसाल

​00 बालको की ‘उन्नति’ परियोजना ने बदली किस्मत; पति को ऑटो दिलाया, अब हर माह कमा रहीं 15 हजार

TTN डेस्क

​कोरबा: हौसले बुलंद हों और सही मार्गदर्शन मिले, तो राह की हर मुश्किल आसान हो जाती है। इसे सच कर दिखाया है लालघाट निवासी गंगोत्री विश्वकर्मा ने। कभी परिवार पालने के लिए रोज की दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर रहने वाली गंगोत्री आज क्षेत्र में ‘मशरूम दीदी’ के नाम से अपनी पहचान बना चुकी हैं। उनकी यह सफलता न केवल उनके परिवार के लिए संबल बनी है, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।

​0 2 बैग से 200 बैग तक का सफर

गंगोत्री बताती हैं कि साल 2019 उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट था, जब वे बालको की ‘उन्नति’ परियोजना के तहत ‘जय मां हर्षिता स्व-सहायता समूह’ से जुड़ीं। शुरुआत आसान नहीं थी; प्रशिक्षण के बाद पहले प्रयास में लगाए गए 16 बैग में से केवल 2 में ही मशरूम उगे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वैज्ञानिक बारीकियों को समझा और आज उनकी इकाई में 200 बैग से मशरूम उत्पादन हो रहा है।

​0 कोविड के संकट में बना सहारा

गंगोत्री के जीवन का सबसे कठिन दौर कोविड काल था। पति की आमदनी बंद हो गई थी, लेकिन मशरूम की खेती ने परिवार को टूटने से बचा लिया। इसी कमाई से हुई बचत और बालको के सहयोग से उन्होंने एक ऑटो खरीदा, जिसे आज उनके पति चलाते हैं। अब घर में आर्थिक तंगी की जगह भविष्य के सपने हैं।

​0 वैज्ञानिक पद्धति से आत्मनिर्भरता

गंगोत्री अब खुद बीज मंगवाती हैं और अन्य महिलाओं को भी उपलब्ध कराती हैं। पैरा-कुट्टी के उपचार से लेकर बायो-स्टिमुलेंट के उपयोग तक, वे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से खेती कर रही हैं। वर्तमान में वे करीब 15,000 रुपये मासिक लाभ कमा रही हैं और उनका लक्ष्य इसे 5 हजार बैग तक ले जाने का है।

​”आज मुझे गर्व है कि लोग मुझे मेरे नाम से ज्यादा ‘मशरूम दीदी’ के रूप में जानते हैं। सही प्रशिक्षण और बालको जैसे संस्थानों के सहयोग से आज मैं अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर निश्चिंत हूँ।” — गंगोत्री विश्वकर्मा, सचिव (जय मां हर्षिता समूह)