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बड़ी खबर…अमेरिका को भारत की दो-टूक: ‘पहले टैरिफ तय करो, तभी करेंगे ट्रेड डील पर साइन’

00 ट्रंप प्रशासन की बदलती नीतियों के बीच भारत का सख्त स्टैंड; बिना स्पष्ट ढांचे के समझौते से इनकार

नई दिल्ली| भारत ने अमेरिका को कूटनीतिक और व्यापारिक मोर्चे पर बेहद कड़ा संदेश दिया है। भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते (ट्रेड डील) पर औपचारिक हस्ताक्षर तभी होंगे, जब अमेरिका अपनी नई टैरिफ संरचना (शुल्क व्यवस्था) को पूरी तरह स्पष्ट और लागू कर देगा। अमेरिका की ओर से मिल रही चेतावनियों के बावजूद भारत अपने इस रुख पर अडिग है।

0 अंतरिम डील और टैरिफ का पेच

गौरतलब है कि फरवरी 2026 में दोनों देशों ने एक अंतरिम ट्रेड डील का ऐलान किया था। इसमें अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ को 50% (जो रूसी तेल खरीद के कारण बढ़ा था) से घटाकर 18% करने का वादा किया था। लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप प्रशासन की ‘रेसिप्रोकल टैरिफ नीति’ को गैर-कानूनी घोषित किए जाने के बाद स्थिति बदल गई। इसके बाद ट्रंप ने वैश्विक स्तर पर पहले 10% और फिर 15% के नए टैरिफ थोप दिए, जिससे पुरानी वार्ताओं का आधार ही हिल गया।

0 मलेशिया ने तोड़ा नाता, भारत ने दिखाया संयम के साथ दम

अमेरिकी नीतियों में आए इस उतार-चढ़ाव से वैश्विक स्तर पर नाराजगी है। मलेशिया ने तो अमेरिका के साथ अपनी डील को ही अमान्य घोषित कर दिया है। हालांकि, भारत ने बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं, लेकिन बिना ठोस गारंटी के आगे बढ़ने से मना कर दिया है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने स्पष्ट कहा कि हम बारीकियों पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन अंतिम हस्ताक्षर तभी होंगे जब अमेरिका का ‘टैरिफ आर्किटेक्चर’ पूरी तरह सामने आ जाएगा।

0 धमकी के बीच स्वाभिमान की राजनीति

अमेरिका ने संकेत दिए हैं कि डील से पीछे हटने पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं, लेकिन भारत का यह रुख दर्शाता है कि वह राष्ट्रीय हितों और आर्थिक स्पष्टता से समझौता नहीं करेगा। यह फैसला वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति और स्वतंत्र विदेश नीति का एक बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।

0 प्रमुख बिंदु:

* तारीख: 16 मार्च 2026।
* मुख्य मांग: अमेरिका अपनी नई टैरिफ व्यवस्था (शुल्क ढांचा) को लिखित और स्पष्ट करे।
* विवाद की जड़: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला और उसके बाद ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ।
* भारत का रुख: व्यापारिक पारदर्शिता के बिना कोई औपचारिक समझौता नहीं।