




00 चंपारण में भागवत कथा के दौरान श्रद्धा और उल्लास से मनाया गया ‘फूल फाग मनोरथ’
TTN डेस्क
चंपारण, छत्तीसगढ़। श्री महाप्रभु जी की बैठक के सत्संग भवन में नागपुर के भाटिया, कंकाल एवं फु परिवार द्वारा आयोजित संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में शनिवार को फूल फाग मनोरथ का प्रसंग अत्यंत उल्लास के साथ मनाया गया। फूलों की वर्षा के बीच आयोजक परिवार के सदस्यों और श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक इस दिव्य उत्सव में भाग लिया।
0 व्यासपीठ से महाराज का उद्बोधन
व्यासपीठ पर विराजित पंडित कमलेश जटाशंकर दवे महाराज ने कथा प्रवाह के मध्य रुककर मधुर मुस्कान के साथ श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि इन फूलों की सौम्यता और सुंदरता को हमें अपने जीवन में उतारकर उसे भी एक खूबसूरत बगिया का रूप देने का संकल्प लेना चाहिए।
कमलेश महाराज ने ‘फूल फाग मनोरथ’ का महत्व समझाते हुए कहा: “प्रेमियों! हरि नाम के रसिकों! फागुन का नाम आते ही मन में रंग और गुलाल आता है। परंतु मेरे पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय में, भगवान को रिझाने का एक अनुपम तरीका है—’फूूल फाग मनोरथ’। यहाँ रंग गुलाल का नहीं, बल्कि फूलों की पंखुड़ियों का है; सुगंध इत्र की नहीं, बल्कि कमल, गुलाब और मोगरा के पुष्पों की है।”
0 जीवन को सद्भाव के फूलों से सजाने का आह्वान
महाराज ने ‘मनोरथ’ को हृदय की तीव्र इच्छा बताते हुए कहा कि जिस तरह कथा आयोजक परिवार और श्री भगवान भवन ट्रस्ट, महाप्रभु बैठक, चंपारण में यह भव्य मनोरथ (भागवत कथा) संपन्न हो रहा है, यह ठाकुर जी की कृपा से सिद्ध हुआ एक अद्भुत कार्य है।
उन्होंने आगे कहा: “इस ‘फूल फाग मनोरथ’ में हम अपने श्याम सुंदर के साथ फूलों से होली खेलते हैं, जो प्रेम और सौम्यता का प्रतीक है। हमारा जीवन भी एक मनोरथ है। हमें इसमें ईर्ष्या-द्वेष के रंग नहीं लगाने हैं, बल्कि प्रेम और सद्भाव रूपी फूलो के फाग से प्रभु को रिझाना है। जब हम अपने जीवन में फूलों-सी कोमलता और सुगंध-सी सेवा भरते हैं, तभी हमारे हृदय में साक्षात श्रीकृष्ण की वह दिव्य होली उतरती है। हम भी संकल्प लें कि हम अपने हृदय को फूलों का बाग बनाएंगे और सेवा तथा प्रेम से प्रभु का ‘फूूल फाग मनोरथ’ करेंगे। राधे राधे!”
0 आज होंगे वामन अवतार और नंदोत्सव
कथा आयोजन के अंतिम चरण में 30 नवंबर को वामन अवतार, श्री राम और श्री कृष्ण जन्म के साथ नंदोत्सव का प्रसंग मनाया जाएगा। कथा में महाराज के साथ आई मंडली अपने कीर्तन भजन की रसधारा से कथा को और भी सरस बना रही है।


