
00 मन व्यथित, परंपरा का अपमान असहनीय बताकर ठुकराया प्रशासन का प्रस्ताव
TTN डेस्क
प्रयागराज, 28 जनवरी 2026
प्रयागराज के पावन संगम तट पर चल रहे माघ मेले में 11 दिनों से धरने पर बैठे ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बुधवार को बड़ा फैसला लिया। मौनी अमावस्या पर पालकी से संगम स्नान रोके जाने के विरोध में शुरू हुए आंदोलन के बाद उन्होंने बिना पवित्र स्नान किए ही मेला क्षेत्र छोड़ दिया और काशी (वाराणसी) के लिए रवाना हो गए।ऐसा पहली बार हुआ है कि मेला से कोई शंकराचार्य बिना स्नान किए वापस लौटे हो।
0 प्रेस कॉन्फ्रेंस में गहरा दुख व्यक्त
प्रस्थान से पहले सुबह आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में शंकराचार्य ने भावुक होकर कहा, “हमारा मन अत्यंत व्यथित और आहत है। ऐसे में संगम स्नान भी शांति नहीं दे सकता। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि प्रयाग की इस पावन धरती से बिना स्नान के लौटना पड़ेगा।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका यह कदम व्यक्तिगत सम्मान के लिए नहीं, बल्कि अनादि काल से चली आ रही धार्मिक परंपरा और सनातन धर्म के गंभीर सवालों को लेकर था।
0 प्रशासन का प्रस्ताव ठुकराया
मेला प्रशासन ने उन्हें एक पत्र और प्रस्ताव भेजा था, जिसमें पूरे सम्मान के साथ पालकी में संगम ले जाकर स्नान कराने, फूल बरसाने और विशेष व्यवस्था का आश्वासन दिया गया था। शंकराचार्य ने इसे सिरे से ठुकरा दिया और कहा, “जब दिल में दुख और आक्रोश हो, तब बाहरी सम्मान का कोई अर्थ नहीं रह जाता।”
0 विवाद की शुरुआत और आरोप-प्रत्यारोप
घटना की जड़ 18 जनवरी (मौनी अमावस्या) के मुख्य स्नान पर्व में है, जब सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के नाम पर उनकी पालकी रोकी गई। शंकराचार्य ने संतों-बटुकों के साथ दुर्व्यवहार, मारपीट और छत्र तोड़ने का आरोप लगाया, जबकि प्रशासन ने नियम उल्लंघन और स्टांपेड का खतरा बताया। मेला प्राधिकरण ने दो नोटिस जारी किए, जिसमें शंकराचार्य पद पर भी सवाल उठाए गए।
0 संत समाज और श्रद्धालुओं में भावुक प्रतिक्रिया
शंकराचार्य के इस फैसले को संत समाज और श्रद्धालुओं में गहरा भावनात्मक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। कई संतों ने उनका समर्थन किया है, जबकि राजनीतिक दलों ने भी बयानबाजी शुरू कर दी है। यह घटना माघ मेले की आस्था, परंपरा और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर बड़े सवाल खड़े करती है।


